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क्या आप जानना चाहते हैं कि राधा और कृष्ण केवल देवी-देवता नहीं, बल्कि आपके भीतर की शक्तियाँ हैं? भारतीय ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मानित काव्य-कृति 'मैं ही राधा, मैं ही कृष्ण' जीवन को समझने के तात्त्विक मार्ग का सहज-सरल शब्दों में ऐसा चित्रण है, जिसके सहारे हम भीतर के शक्ति और शक्तिमान दोनों को देख सकें। यह भी समझ सकें कि कृष्ण को पाना है तो राधा बनना ही पड़ेगा। 'मैं ही राधा, मैं ही कृष्ण' भारतीय चिंतन में पुरुषार्थ चतुष्टय-धर्म, अर्थ, काम (माया), मोक्ष पर रचित एक उत्कृष्ट रचना है। पुस्तक के रचयिता डॉ. गुलाब कोठारी के अनुसार जीवन के पुरुषार्थ को समझे बगैर यह दृष्टि विकसित हो पाना मुश्किल है। इसी से जीवन यात्रा का लक्ष्य पाने की प्रेरणा मिल सकेगी। अध्यात्म में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए नई शैली में पुरुषार्थ के व्यावहारिक स्वरूप से परिचित करवाती एक अनुपम कृति। This Moortidevi Award-winning spiritual book explores the divine union within, reinterpreting Dharma, Artha, Kama, and Moksha in a bold and poetic way. Dr. Gulab Kothari invites readers to discover that we are both Radha and Krishna—one with infinite potential for realization.